नाटक - बस... और नहीं
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लेखक- अनिल कुमार निर्देशन- अनिल कुमार
घर के आंगन के एक कोने में एक लड़की कजरी अपने भइया की किताब उलट-पुलट कर रही थी । तभी अचानक उसके भइया का प्रवेश
भइया- ( इधर उधर किताब खोजने के बाद) देख लो, मैं कब से परेशां हूँ । स्कूल का समय हो गया है , और श्रीमती इंदिरा गाँधी यहाँ बैठी पढ़ाई कर रही है। ऐ कजरी, चल छोड़ मेरी किताब, तुझे कितनी बार कहा है, मेरी किताब मत छुआ कर । दो तमाचे दूंगा तो ही समझेगी तू । बड़ी आई किताब पढने वाली ।
कजरी- भइया मैं क्यूँ नहीं पढ़ सकती ?
भइया- (हँसते हुए ) तू पढेगी! तू क्या करेगी पढ़कर ? तुझे कौन सा प्राइम मिनिस्टर बनना है ? मुझे तो डॉक्टर बनना है। ढेरों पैसे कमाने हैं, और पिताजी का नाम रौशन करना है।
कजरी- मैं डॉक्टर क्यूँ नहीं बन सकती भइया ?
भइया- ओफ्फोह ! तेरी वजह से मुझे पहले ही देर हो चुकी है। अब बेकार सवाल करके मेरा दिमाग मत ख़राब कर। जा मां के कम में हाथ बटा।
कजरी- नहीं भइया, पहले मुझे बताओ, मैं डॉक्टर क्यूँ नहीं बन सकती ?
भइया- बस कर मेरी माँ, जा पिताजी से पूछ ले। कह दिया न मेरा दिमाग मत ख़राब कर। जा भाग यहाँ से ।
कजरी- नहीं भइया बताओ न, बताओ न मैं डॉक्टर क्यूँ नहीं बन सकती ?
भइया- (गुस्से में आ जाता है) तू ऐसे नहीं मानेगी। (थप्पड़ जड़ते हुए) चल जा यहाँ से। बड़ी आई डॉक्टर बनने वाली(कोरस में एक गीत के साथ कजरी का दर्द बढ़ता है)।
पिता- (शराबी पिता कजरी के रोने की आवाज सुन कर उसके पास आता है।) क्या हुआ बेटी ? किसने मारा ? (कजरी रोती रहती है।) बोलती क्यूँ नहीं ? किसी ने मारा तुझे ? किसने मारा बता मैं उसे मारता हूँ, बता बेटी।
कजरी- भइया ने मारा पिताजी।
पिता- भइया ने ? अच्छा तो ठीक है, अभी मैं उसकी ख़बर लेता हूँ....गुड्डू ...गुड्डू...(भाई आता है) क्यूँ मर दिया बेचारी को ? देखो कितनी रो रही है।
भाई- वो ....पिताजी ..फ़िर मेरी किताब इसने ले ली थी, मुझे स्कूल को देर हो रही थी, और ये उल्टे-सीधे सवाल कर रही थी, कह रही थी मैं भी किताब पढूंगी, मैं भी डॉक्टर बनूँगी....इसीलिए....
पिता- तो क्या हुआ पगले, बोल ही तो रही थी बेचारी, डॉक्टर बन तो नहीं गई न ? ठीक है तू स्कूल जा। मैं इसे समझाता हूँ। जा बेटा जा...चुप हो जा बेटी, भइया गुस्से में थे इसीलिए मारा , अब नहीं मारेंगे ...ठीक है...चुप हो जा।
कजरी- पिताजी मैं भी पढ़ना चाहती हूँ।
पिता- बेटी, तू क्या करेगी पढ़कर ? हमारे घर में लड़कियां नहीं पढ़ा करती हैं। तुम्हे तो मां का ध्यान रखना है, घर के कम-काज सीखना है, फिर एक दिन तेरी शादी हो जायेगी..तू अपने घर चली....
कजरी- पिताजी , मैं घर का भी ध्यान रखूंगी और पढूंगी भी....
पिता- देखो, इसीलिए तुम्हे भइया मारते हैं जिद्द मत करो। तेरी मां पढ़ी लिखी नहीं, तेरी दादी भी पढ़ी लिखी नहीं थी तो क्या हुआ ? तुझे भी पढने की जरुरत नहीं।
कजरी- मेरी दो सहेलियां जो पढ़ती हैं, मैं भी पढूंगी....
पिता- (गुस्से में) अब तू मुझसे भी मार खायेगी, एक बार मना किया न! नहीं पढ़ना है तो नहीं पढ़ना है ।
कजरी- (झल्लाते हुए) क्यूँ नहीं पढ़ सकती ये तो बताओ ? मेरे भइया और मुझसे पिता पिता अरे ?
पिता - अरे ! तू मुझसे ऐसे सवाल करेगी ? तेरी इतनी हिम्मत ? (कहते हुए कजरी को मारता है । गीत के द्वारा कजरी द्वारा पिता से प्रश्न । पिता चला जाता है )
इन्द्रदेव - हे देव ! यह पृथ्वी पर क्या घटित हो रहा है ?
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भइया- ( इधर उधर किताब खोजने के बाद) देख लो, मैं कब से परेशां हूँ । स्कूल का समय हो गया है , और श्रीमती इंदिरा गाँधी यहाँ बैठी पढ़ाई कर रही है। ऐ कजरी, चल छोड़ मेरी किताब, तुझे कितनी बार कहा है, मेरी किताब मत छुआ कर । दो तमाचे दूंगा तो ही समझेगी तू । बड़ी आई किताब पढने वाली ।
कजरी- भइया मैं क्यूँ नहीं पढ़ सकती ?
भइया- (हँसते हुए ) तू पढेगी! तू क्या करेगी पढ़कर ? तुझे कौन सा प्राइम मिनिस्टर बनना है ? मुझे तो डॉक्टर बनना है। ढेरों पैसे कमाने हैं, और पिताजी का नाम रौशन करना है।
कजरी- मैं डॉक्टर क्यूँ नहीं बन सकती भइया ?
भइया- ओफ्फोह ! तेरी वजह से मुझे पहले ही देर हो चुकी है। अब बेकार सवाल करके मेरा दिमाग मत ख़राब कर। जा मां के कम में हाथ बटा।
कजरी- नहीं भइया, पहले मुझे बताओ, मैं डॉक्टर क्यूँ नहीं बन सकती ?
भइया- बस कर मेरी माँ, जा पिताजी से पूछ ले। कह दिया न मेरा दिमाग मत ख़राब कर। जा भाग यहाँ से ।
कजरी- नहीं भइया बताओ न, बताओ न मैं डॉक्टर क्यूँ नहीं बन सकती ?
भइया- (गुस्से में आ जाता है) तू ऐसे नहीं मानेगी। (थप्पड़ जड़ते हुए) चल जा यहाँ से। बड़ी आई डॉक्टर बनने वाली(कोरस में एक गीत के साथ कजरी का दर्द बढ़ता है)।
पिता- (शराबी पिता कजरी के रोने की आवाज सुन कर उसके पास आता है।) क्या हुआ बेटी ? किसने मारा ? (कजरी रोती रहती है।) बोलती क्यूँ नहीं ? किसी ने मारा तुझे ? किसने मारा बता मैं उसे मारता हूँ, बता बेटी।
कजरी- भइया ने मारा पिताजी।
पिता- भइया ने ? अच्छा तो ठीक है, अभी मैं उसकी ख़बर लेता हूँ....गुड्डू ...गुड्डू...(भाई आता है) क्यूँ मर दिया बेचारी को ? देखो कितनी रो रही है।
भाई- वो ....पिताजी ..फ़िर मेरी किताब इसने ले ली थी, मुझे स्कूल को देर हो रही थी, और ये उल्टे-सीधे सवाल कर रही थी, कह रही थी मैं भी किताब पढूंगी, मैं भी डॉक्टर बनूँगी....इसीलिए....
पिता- तो क्या हुआ पगले, बोल ही तो रही थी बेचारी, डॉक्टर बन तो नहीं गई न ? ठीक है तू स्कूल जा। मैं इसे समझाता हूँ। जा बेटा जा...चुप हो जा बेटी, भइया गुस्से में थे इसीलिए मारा , अब नहीं मारेंगे ...ठीक है...चुप हो जा।
कजरी- पिताजी मैं भी पढ़ना चाहती हूँ।
पिता- बेटी, तू क्या करेगी पढ़कर ? हमारे घर में लड़कियां नहीं पढ़ा करती हैं। तुम्हे तो मां का ध्यान रखना है, घर के कम-काज सीखना है, फिर एक दिन तेरी शादी हो जायेगी..तू अपने घर चली....
कजरी- पिताजी , मैं घर का भी ध्यान रखूंगी और पढूंगी भी....
पिता- देखो, इसीलिए तुम्हे भइया मारते हैं जिद्द मत करो। तेरी मां पढ़ी लिखी नहीं, तेरी दादी भी पढ़ी लिखी नहीं थी तो क्या हुआ ? तुझे भी पढने की जरुरत नहीं।
कजरी- मेरी दो सहेलियां जो पढ़ती हैं, मैं भी पढूंगी....
पिता- (गुस्से में) अब तू मुझसे भी मार खायेगी, एक बार मना किया न! नहीं पढ़ना है तो नहीं पढ़ना है ।
कजरी- (झल्लाते हुए) क्यूँ नहीं पढ़ सकती ये तो बताओ ? मेरे भइया और मुझसे पिता पिता अरे ?
पिता - अरे ! तू मुझसे ऐसे सवाल करेगी ? तेरी इतनी हिम्मत ? (कहते हुए कजरी को मारता है । गीत के द्वारा कजरी द्वारा पिता से प्रश्न । पिता चला जाता है )
इन्द्रदेव - हे देव ! यह पृथ्वी पर क्या घटित हो रहा है ?